Sunday, March 1, 2009

द लॉन्ग नाइन्टी : समय को समझने का एक विनम्र प्रस्ताव

बद्रीनारायण
हिन्दी साहित्य के पब्लिक स्फेयर में `साहित्य में समय´, `अपने समय की अनुगूंज´, `समय से मुठभेड़´ एवं टकराहट जैसे अनेक नारे सुनाई पड़ते रहते हैं। हममें समय की थाप है, आपमें नहीं, ऐसा कहकर समय का `ऑथरटेटिव मीनिंग´ विकसित किया जाता है एवं उस मीनिंग से साहित्य के अन्य तलों में मौजूद समय के अनेक रूपों का ध्वंस कर रचना के अन्य रूपों, जो हमसे भिन्न हैं, को खारि$ज कर रचना का एक होमोजेनियस प्रारूप बनाने एवं उसे प्रभावी रखने की कोशिश की जाती है। समय एक तानाशाह है। इस तानाशाह की तानाशाही करते हुए विचारक, कुछ आलोचक, कुछ कवि रचना जगत की प्रसिद्ध पर कब्जा चाहते रहे हैं। लेकिन ऐसी व्याख्याओं में आधारभूत दोष यह है कि इनमें समय को देखने का नजरिया ही थोड़ा भोंडा, थोथा, स्थूल एवं खोखला होता है। जब समय को देखने का नजरिया ही दोषपूर्ण है तो साहित्य में समय की खोज की कोशिश कितनी निष्पक्ष होगी। इस आलेख में मेरी कोशिश `नब्बे के समय के बनने की प्रक्रिया´ पर विचार करना है।
समय की अवधारणा पर कुछ बातें : अगर आप मेरे गाँव के एक अपढ़ किसान को दार्शनिक मानें, तो उसके लिए भी समय एक और एक-सा नहीं है। एक ही साथ वह समय को विकट मानता है, प्रारब्ध मानता है, नियति मानता है। वह कठिन समय में भी कर्मठ होते हुए पर्व-त्यौहार, एवं व्रतों के रूप में अपने जीवन समय को सेलिब्रेट करता है। उसके लिए एक तो समय एक-सा नहीं है। समय क्षण-क्षण परिवर्तनशील है। वह समय में ही जीता है, समय से वह लड़ता है, पर समय पर उसका नियंत्रण नहीं है। समय पर किसी और का नियंत्रण है। भाग्य, भगवान या नियति का। यहाँ पर समय में वह जीता है, समय उसमें जीता है, पर समय इसका सेल्फ न होकर `अदर´ हो जाता है। एक अपढ़ श्रमिक खेतीहर के लिए `दैनिक जीवन-समय´ के भीतर ही `श्रम समय´, `आध्यात्मिक समय´, `रिचुअल एवं सेलिब्रेशन समय´ इत्यादि एक साथ ही जीवनचर्या में बहुल स्पेस बनकर सक्रिय होते हैं।
नगरीय समय बोध की तरह यहा¡ कैलेण्डर, घड़ी, जयंतियों, शताब्दियों एवं सरकारी कार्यालयीन अवकाशों के रूप में समय विद्यमान नहीं होता है। हाला¡कि बढ़ते बा$जार का ग्रामीण क्षेत्रों में प्रसार, ग्राम्य जीवन के जीवनपरक उत्पादों का व्यावसायिक उत्पादों में तब्दीली, उनका निर्यात, मोबाइल, पी.सी.ओ. की उपस्थिति एवं संचार से जुड़ी गतिविधियों इत्यादि ने ग्रामीण जीवन के समय बोध एवं `ग्रामीण टाइम स्पेस´ में गतिशील अनेक `टाइम स्पेस´ की उपस्थिति को हतकर `एक इम्पटि होमोजिनियस स्पेस´ में तब्दील कर रहा है। अगर आप अनपढ़ ग्रामीण श्रमिक किसान का समय बोध, जो उसकी हथेलियों की रेखाओं और ललाटों में लिखा होता है, जिसे वह दिन-रात खटखट कर बदलता है। ये रेखाए¡ उसके श्रम से बदलती हैं, किन्तु जिसे वह अपरिवर्तनशील मानता है। एक किसान के समय बोध में आपको एम्बीवेलेन्स दिखाई पड़ेगा, एक तरफ तो वह यह मानता है कि दिन (समय) बदलता है, `सब दिन होत न एक समाना´ वहीं दूसरी ओर वह यह भी मानता है कि सब कुछ पहले से लिखा हुआ है। अर्थात बदलती परिस्थितियों और सन्दर्भों के अनुसार वह समय को कभी नियत और कभी परिवर्तनशील मानता है।
वही परम्परावादी ज्ञानी दार्शनिकगण यथा- आनन्द कुमार गोस्वामी, रेनेग्योनान, गोपीनाथ कविराज तथा उनकी वर्तमान सन्ततिया¡, यथा- गोविन्द चन्द पाण्डेय, यशदेव शल्य जैसे टीकाकार या थोड़ी आधुनिक-सी दिखती कपिला वात्स्यायन या अपने अज्ञेय जी समय को सदा शाश्वत, सदा अपरिवर्तनीय अर्थात सनातन मानते रहे हैं। अब यह अलग बात है कि प्रो. अरविन्द शर्मा जैसे विद्वान इस `सनातनता´ को आधुनिक अर्थ देने की कोशिश करते हुए उस अपढ़ किसान दार्शनिक से इसे जोड़ने की कोशिश करते दिख जायेंगे। या गोविन्दचन्द जी कहेंगे कि लोक में जो भी समय बोध है, वह पौराणिक एवं शास्त्रीय समय बोध का ही प्रसार एवं अनुकरण है, जो सनातन है अर्थात अपरिवर्तनशील है। विद्वानों का यह संवर्ग समय चक्र में किसी भी परिवर्तन को विकार मानता है। उनका सनातन अविकारी है एवं होमोजिनियस एवं होलिस्टिक है। ऐसे लोग पौराणिक समय बोध जो चक्रीय (सरकुलर) है, पर गहन विश्वास करते हैं। पश्चिमी समाज का समय बोध भी भयानक रूप से होमोजिनियस है, जो लिनियरिटि (एकरैखिकता) में विश्वास करता है।
भारतीय परम्परावादी एवं पश्चिमी आधुनिकतावादी दोनों में ही समय को व्याख्यायित करने के सन्दर्भ में एक मामले में एकरूपता है कि दोनों ही एक समय में रहते हुए भी अनेक टाइम स्पेस को नकारते हैं। इस प्रक्रिया में परम्परावादी एवं आधुनिकतावादी दोनों ही समाज के प्रभावी सत्ताओं के अधिपत्यशाली बोध को ही एकमात्र समय बोध मानते हुए शक्तिहीनों के समय बोध को नकारने की कोशिश करते हैं। साथ ही समय के आदर्श एवं एब्सट्रैक्ट अर्थ पर $जोर देते हुए समय के सामाजिक निर्मित्ति को नकारते हैं।
जाहॉनेस फेबियन ने अपने अत्यन्त प्रसिद्ध किन्तु नवीन शोध `टाइम एण्ड द अदर´ : हाऊ एन्थ्रोपोलॉजी मेक्स इट्स आब्जेक्ट (कोलोम्बिया युनिवेर्सिटी प्रेस, कोलोम्बिया) में एक महžवपूर्ण स्थापना करते हैं कि हम एक ही समय में रहते हुए अनेक समय स्पेस में जीते हैं। चू¡कि समाज अनेक स्तरों में ब¡टा है, अत: अनेक स्तरों में बंटे समाज में अनेक समय स्पेस होंगे। आपने पहले के मेरे वृत्तान्त में देखा कि किस प्रकार एक अपढ़ किसान का समय बोध दार्शनिकों से भिन्न है। वहीं पिछले लोकसभा चुनाव में हम लोग इलाहाबाद के पास के एक जनजातीय आबादी वाले गा¡व में लोगों का साक्षात्कार ले रहे थे। गन्नू नाम के एक गोंड से हम लोगों ने पूछा- आप मुरली मनोहर जोशी को वोट देने की बात कर रहे हैं, आपको पता है वो कौन हैं? उसने कहा- वे गा¡धी जी की पार्टी के हैं। गा¡धी जी के बेटे हैं। देखिये, इस गोंड के लिए आज भी समय 1955 के आसपास ही रुका है। वहीं इलाहाबाद शहरवासियों के लिए `समय´ इक्कीसवीं शताब्दी, आई.टी. युग में प्रवेश कर चुका है। अगर हम आ$जादी के बाद 1950 के समय के अर्थ पर ही विचार करें तो 1950 अथाüत् भारतीय आ$जादी का प्रभात भारतीय समाज के आभिजात्यों के लिए अलग या एवं दलितों के लिए, जनजातीय समाजों के लिए तो और भी अलग होगा।
नाइन्टीज की निर्मित्ति का लॉन्ग डूरे : उपयुüक्त विमर्श से जो बात निकलती है, उनमें से कुछ का इस्तेमाल हम यहा¡ नब्बे के समय पर बात करते हुए करना चाहेंगे। एक तो हम नब्बे के समय की सामाजिक निर्मित्ति तलाशना चाहेंगे। दूसरे हम इस पर बात करते हुए समय की सनातनता की अवधारणा को भंग करना चाहेंगे। समय अपने एब्सट्रैक्ट एवं आदर्श अथोZ में सनातन हो सकता है, किन्तु मानुष अपने जीवन क्रम में उसकी सनातनता को बार-बार भंग करता है। समय की आविष्कृत सनातनता के इसी भंगीकरण के क्रम में समय अपना अर्थ पाता है। समय की सनातनता के इसी भंगीकरण के क्रम में सामाजिकता या `सोशल टाइम´ रचा जाता है और शायद इसी क्रम में समय की सामाजिक निमिüति सम्भव हो पाती है। फ्रा¡सीसी इतिहासकार फनाüन्ड ब्रॉदेल अपने प्रसिद्ध `द व्हील ऑफ कॉमर्स´ में आम मानुष के दैनçन्दन जीवन में एब्सट्रैक्ट समय की इसी सनातनता के भंगीकरण की सामाजिक एवं आर्थिक प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन करते हैं।
फ्रेंच एनाल्स स्कूल जब भी किसी समय अथवा समय-खण्ड पर विचार करता है तो उसे वह `फिज्ड´ एवं `फिक्स्ड´ समय इकाई के रूप में नहीं देखता। इतिहास को मात्र घटनाओं तक ही सीमित करके नहीं देखता, वरन् `लॉन्ग डूरे´ के रूप में देखता है। अर्थात कोई भी समय एक समय-खण्ड की इकाई मात्र न होकर एक प्रक्रिया है, जो उस समय के पहले भी घटित होता रहता है एवं उस समय के बाद भी। उक्त समय-खण्ड को निर्मित करने में उसके पहले का सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक इतिहास एवं उसके बाद के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक इतिहास में उसकी व्याप्ति का अवलोकन दोनों मिलकर उस समय की इकाई का अर्थ सृजित करते हैं।
पुन: वह समय-खण्ड अपने आप में एक आइसोलेटेड खण्ड नहीं होता। उक्त समय में भी अनेक समय बोध अनेक समुदायों में सक्रिय होते हैं। ये समय बोध अगर नामवर जी की मानें तो आमने-सामने न होकर अगल-बगल होते हैं। गोविन्द वल्लभ पन्त सामाजिक विज्ञान संस्थान, इलाहाबाद में `साहित्य एवं समय : पीढियाँ आमने-सामने´ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में नामवर जी ने अनेक पीढियाँ, जो उनके समय बोधों के साथ एक ही समय में सक्रिय होती हैं, उनका आपसी सम्बन्ध बनाम एवं टकराव का न होकर आपसी सह-अन्त:संवाद का होता है, जैसी राय व्यक्त की थी। उन्होंने यह भी बताया था कि ऐसे ही समकालीनता बनती एवं अर्थ पाती है। अगल-बगल रह रहे अनेक समय बोध मिलकर एक निçश्चत समय-खण्ड का अर्थ रचते हैं साथ ही अलग-अलग अपना भी अर्थ रचते हैं।
आज़ादी के बाद भारतीय जनतंत्र के इतिहास में 50, 60 एवं 90 - तीन महžवपूर्ण समय-खण्ड हैं। 50 इसलिए, क्योंकि हमें आज़ादी मिली थी, आज़ादी की लड़ाई के दौरान जनगण ने जिन सपनों को देखा था, उन्हें सच होने की प्रक्रिया प्रारम्भ होनी थी या पूरा होना था। दूसरे आजाद भारत में जनतांत्रिक चुनाव एवं जनतांत्रिक चुनाव में नये सपनों एवं वादों को देखने एवं दिखाने का यह पहला अवसर था। यही वह वक्त था जब फूलपुर संसदीय क्षेत्र से नेहरू जी चुनाव लड़ रहे थे और उनकी चुनाव सभाओं में दलित जनगीत गा रहे थे-
भारत स्वर्ग लोक होइ जाइहीन
धीर धरा सजनी
धीर धरा सजनी
छुआछूत का भेद मिटाई हैं
इ देखा बुद्धिमानी
पंडित धोबी के घर खाइहैं
धीर धरा सजनी
भारत स्वर्ग लोक ..........
विधा का परचम है भारी
अब खुल गये मदरसे
बिजली, ट्यूबवेल, नहर गड़े में
नाही बाटे अरसा
नाही बाटे अरसा
नदिया¡ दूधन से भर जाइहैं
धीर धरा सजनी
लेना-देना तेरही-बरही
सब छूट जाइहैं
पू¡जीपूति बैइठ रोइहैं
धीर धरा सजनी

इस गीत में यह सपना था कि सबको खाने को चावल मिलेगा, हर तरफ नहर एवं बिजली हो जायेगी, शिक्षा का प्रसार होगा और हर तरफ मदरसा खुल जायेगा। साथ में सबसे बड़ा सपना था कि ब्राrाण धोबी के घर खाने में परहेज नहीं करेगा। जिनमें कुछ सपने सच हुए, कुछ सपनों को अभी भी सच होना है।
यह एक प्रकार से भारतीय राष्ट्रवाद एवं जनतांत्रिक राज्य के मेटानैरेटिव के उद्भव एवं विकास का काल था। जिसमें सबके सपने जो आ$जादी की लड़ाई के दौरान एक थे, नवीन विकासपरक आकांक्षाओं के साथ जुड़कर विस्तारित हो रहे थे। भारतीय कल्याणकारी राज्य से अपेक्षाए¡ बढ़ रही थीं कि इस वक्त भी भारतीय समाज के आभिजात्य का समय बोध सचमुच 1950 में था, जो भारतीय राज्य की शक्ति एवं सुविधाओं को ज्यादा से ज्यादा हथिया लेना चाहता था, वहीं दलित पिछड़े एवं उपेक्षित तबके अभी भी आ$जादी की लड़ाई के दिनों में अपने सरवाइवल के लिए अंग्रेजी साम्राज्य के दंश से उबरने, क्रिमिनल ट्राइब एक्ट इत्यादि से मुक्ति की स्थिति बनने के सपने में पड़े थे। किन्तु जीवन के लिए बेहतर स्थिति के उनके सपने विकास की आकांक्षाओं से भी जुड़ने लगे थे, और 50-60 के बीच भारतीय समाज के राष्ट्रवाद का मेटानैरेटिव जो ग्रास रुट पर उतना नहीं बना था, जितना प्रचारित हुआ था, टूटने लगा था।
फणीश्वरनाथ रेणु इसी वक्त अपने उपन्यास `मैला आ¡चल´ में अत्यन्त सबवçर्सव ढंग से भारतीय ग्राम समाज में घटित होने वाले इस स्वपAभंग एवं इस स्वप्नभंग से जनित क्षोभ एवं टकराव का अंकन कर रहे थे। भारतीय गा¡व पर 50 से 60 के बीच जो भी अध्ययन हो रहे थे, विकास की जो योजनाए¡ बन रही थीं, उनका स्वर भी दलित एवं उपेक्षितों पर केçन्द्रत नहीं था। गा¡व के नाम पर गा¡व के अभिजन का जय हो रहा था। एक तरफ 1950 के दशक में बन रहे भारतीय राज्य के विकासपरक प्रोजेक्ट्स पर तथाकथित `राष्ट्रीय अभिजन´ का कब्जा हो रहा था, वहीं दूसरी तरफ उपेक्षित समुदाय की आकांक्षाए¡ बढ़ रही थीं, जो उनमें अनेक भारतीय राष्ट्रवाद के प्रति उनके स्वपAभंग का बीज बो रहा था। परिणामत: 1960 के दशक में भारतीय राष्ट्रवाद के प्रति मोहभंग स्पष्ट रूप से दिखने लगता है। दलित शिक्षित लेखक संवर्ग 1960 के बाद भारतीय राष्ट्रवाद के दलित नायकों को ढू¡ढ़ना शुरू करता है। भारतीय राष्ट्रवाद के वृत्तान्त में अपनी छवि खोजना शुरू करता है। अछूतानन्द, अम्बेडकर जैसे लोग जो मुख्यधारा के राष्ट्रवाद से टकरा रहे थे, से भिन्न 1960 के बाद का शिक्षित दलित जन मुख्यधारा के राष्ट्रवादी वृत्तान्त में अपने नायक ढू¡ढ़कर आ$जादी की लड़ाई में अपनी भूमिका एसर्ट कर भारतीय जनतांत्रिक राज्य के कल्याणकारी प्रोजेक्ट्स में अपना शेयर मा¡ग रहा था। 1960 का यह मोहभंग एवं भारतीय जनतंत्र पर एक खास तबके के कब्जे की यह अनुगू¡ज उस समय की मुख्यधारा के साहित्य में भी दिखाई पड़ने लगी थी। मुक्तिबोध की कविता `अ¡धेरे में´ उस समय की सम्पूर्ण कशिश को अत्यन्त आलोचनात्मक ढंग से अभिव्यक्त करती है। आ$जादी की लड़ाई के दौरान उभरे सपने से बने भारतीय जनतंत्र के हाइजैक हो जाने की कथा को अत्यन्त संशय एवं भय के साथ वे `अ¡धेरे में´ कविता में जगह देते हैं। 1960 के बाद ही 1962 में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के समानान्तर दलित अपनी नायिका झलकारीबाई की रचना करते हैं, जिसकी अभिव्यक्ति भवानीशंकर विशारद की लोकप्रिय पुस्तिका `वीरांगना झलकारीबाई´ में होती है।
1960-80 के मध्य भारतीय राष्ट्रवाद का राजसत्ता एवं अभिजन रचित वृत्तान्त में दरकन की प्रक्रिया विकसित हो रही थी। भारतीय जनतांत्रिक सत्ता से मोहभंग की प्रक्रिया तेज हो रही थी। कल्याणकारी योजनाओं का लाभ आधारतल तक पहु¡च नहीं रहा था और ऊपर ही ऊपर कई नये उभरे सत्ता समूह (चील-बाज) उन्हेंे झपट ले रहे थे। भारतीय जनतांत्रिक राजसत्ता की संकटग्रस्तता बढ़ती जा रही थी। परिणाम 70-80 के कालखण्ड की इमजेüन्सी में दिखाई पड़ता है। इसलिए 70-80 तक के कवियों की रचनाओं में अगर आप देखें तो जनतांत्रिक स्वप्रों, जिसके मोहभंग की शुरुआत 60 में हो चुकी थी, उनका विस्तार दिखाई पड़ता है। जे.पी. आन्दोलन, इमजेüन्सी की प्रतिरोधी राजनीति से बने उनके मानस में और साहित्य में भी प्रदर्शनकारी राजनीतिक (जुलूस, घटना, प्रदर्शन, अòबवियस पॉलिटिक्स की) मा¡ग का आग्रह दिखाई पड़ता है। 70-80 तक के कवियों की एक धारा, जो महानगरीय चेतना बोध से जुड़ी है एवं उस तबके का हिस्सा रही है, जिसने शहरों में आपातकाल के विरोध का नेतृत्व किया था, में ऐसी खुली पçब्लक स्पेस की राजनीति का घनघोर आग्रह दिखाई पड़ता है। इस समय-खण्ड में ही इमजेüन्सी के प्रतिरोध से उभरी राजसत्ता एवं उसके स्वप्र भी भंग होते हैं। इसी कालखण्ड में वे कवि ज़्यादा बेहतर कविताए¡ लिखते हैं, जो इमजेüन्सी से उभरे जन्स्वप्र को मरते देख उसकी प्रतिक्रिया एवं प्रक्रिया में रचना लिख रहे थे। अरुण कमल, राजेश जोशी, विष्णु नागर, असद की कविताए¡ इन्हीं काव्य प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करती दिखती हैं।
80 से 1990 का कालखण्ड जो द ला¡ग नाइन्टीज का निणाüयक कालखण्ड है, में विश्व मानवीय विकास के इतिहास में एक महžवपूर्ण दुर्घटना होती है, वह है सोवियत रूस का पतन। प्रतिरोध एवं परिवर्तन के महान स्वपA का भंग। इस घटना ने पूरी दुनिया में एक संशय एवं भय को जन्म दिया। मानवीय भविष्य की इस संकटग्रस्तता में `वलनरविलिटि´-स्वपAभंग की पीड़ा, आत्मखोज, लोकसमाजों के संdोतों को लेकर प्रतिरोध के नये dोतों की तलाश 80 से 90 के दशक की कविता की मूल प्रवृत्ति बनी। एकान्त श्रीवास्तव, नवल शुक्ल, कुमार अम्बुज, देवीप्रसाद मिश्र निलय की कविताए¡ इन प्रवृत्तियों से उभर रही थीं। बाद में पवन करण, चेतन क्राçन्त, पंकज चतुवेüदी, व्योमेश शुक्ल इत्यादि अनेक कवि इस समय की संकटग्रस्तता की रचनात्मक अभिव्यक्ति करते हैं। राजनीति के खुले रूपों के अतिरिक्त राजनीतिक के नये सन्दभोZ में विकसित हो रहे रूपों की रचनात्मक तलाश की इस दौर के कवियों की कोशिशों को मिसरीड किया गया, क्योंकि चश्मा पुराना था, और इमजेüन्सी के दौरान के उभरे चश्मे से उन्हें देखा गया। यह नहीं समझा गया कि इस दौर में विश्व इतिहास एक बड़े अभिशाप का शिकार हो गया है। दुनिया एक धु्रवीय होने जा रही है और पूरी दुनिया एक बा$जार में तब्दील होने जा रही है। प्रतिरोध एवं राजनीति के ऑबवियस `फार्म्स´ खतरे में हैं, नये प्रतिरोधी रूपों की तलाश दृष्टि, विचार एवं रचना के लिए $जरूरी हो गये हैं। 80-90 के दौर में ही भारतीय जनतांत्रिक राजनीति फ्रैक्चर्ड होती है। सत्ता की केन्द्रीयता टूटती है। उपेक्षितों की राजनीति बलवती होती है, नये सामाजिक समूह भारतीय जनतांत्रिक राजनीति में महžवपूर्ण होते जाते हैं। यह सब सामाजिक, राजनीतिक प्रक्रियाए¡ हमारे आलोचनात्मक चेतना बोध एवं रचनात्मक स्फेयर में महžवपूर्ण परिवर्तन ला रही थीं।
भारतीय राजसत्ता सिकुड़ती जा रही है। नयी आर्थिक नीति लागू हो रही है। ग्लोबलाइजेशन की आधार भूमि के लिए बा$जारीकरण एवं प्राइवेटाइजेशन जैसी आर्थिक एवं राजनीतिक प्रक्रियाए¡ चल रही हैं। 80 से 90 के दौर में बा$जार कन्ज्यूमरिज़्म एवं नये तकनीक के साथ नये सूचना संजाल इन्टरनेट बलवान हो रहा था। रूस के पतन के बाद अमेरिका की आक्रामकता बढ़ने लगी थी, इराक पर बार-बार आक्रमण हो रहे थे, इराक में ही नहीं दुनिया में अच्छी, सुन्दर, नाजुक ची$जों, भावनाओं एवं सम्बन्धों पर घातक आघात हो रहे थे। इस दौर में उभर रही कविता एवं कहानी (उदय प्रकाश, अखिलेश जैसे सशक्त कथाकार) ला¡ग नाइन्टीज के इन आघातों, परिवर्तनों एवं दंशों को अपनी रचना में बाणी दे रहे थे।
एक तरफ आधुनिकता का प्रोजेक्ट अनफिनिस्ड था। इसके पॉजीटिव योगदानों के साथ-साथ ऑप्रेसिव प्रभाव ज़्यादा मुखर होने लगे थे। इसी खण्ड में आधुनिकता के प्रोजेक्ट के क्रिटिक के रूप में उत्तर आधुनिकता आ रही थी। ऐसे में इस दौर में जिन कवियों एवं कथाकारों का मानस बन रहा था, उनके लिए ची$जों, परिवर्तनों एवं संघटनाओं को समझने की सरल गणित गड़बड़ा चुकी थी। इस गड़बड़ाये सरल गणित, में जो जटिल रचनात्मक भावबोध बन रहे थे, इन्हें आज तक न ठीक से समझा गया है, न ही कुछ आलोचनाओं को छोड़कर इन पर ठीक से आलोचनात्मक बातचीत हुई है। साहित्य में विषय एवं एजेण्डे बदल रहे थे। साम्प्रदायिकता का विषय तो था, पर तरह-तरह का आतंकवाद प्रभावी हो रहा था, सामूहिक संहार का खतरा बढ़ रहा था, पर्यावरण, उपेक्षित समुदायों के प्रश्न, सबाल्टनü प्रश्न महžवपूर्ण हो रहे थे। दलित प्रश्न खड़े हो रहे थे, नारी प्रश्न उभर रहे थे। इस दौर के रचनाकार इन नये सवालों से जूझ रहे थे, जो 70-80 के दौर के रचनाकारों के लिए महžवपूर्ण नहीं था।
पर 70-80 के दौर में उभरी आलोचनात्मक दृष्टि एवं टाइप्स से ही `ला¡ग नाइन्टीज´ 80-90 से 90 से 2000, जिसका विस्तार यह इक्कसवीं सदी है, को देखा जा रहा है। ला¡ग नाइन्टीज मोबाइल, एस.एम.एस., टेलीविजन, नेट, नये सूचना संजालों से बने एक वचुüवल कम्युनिटी एवं वर्चुअल रियलिटी से टकरा रहा है, जहा¡ 80 के पूर्व के रियलिटी (यथाथü) का अर्थ बदल चुका है। महाकाव्यात्मक (रामायण, महाभारत) मिथक से इतर हम एक नये `मिथिक टाइम´, जो इस वर्चुअल स्फेयर ने तैयार किया है, से गु$जर रहे हैं। ग्लोबलाइजेशन, बा$जार, उसकी सुविधा, सुख एवं उसकी हिंसा भी `कुछ के सुख पर अनेकों के दुख´ को देख रही इसी पीढ़ी की दुविधा की रचनात्मकता, जो आज हमारे सामने है, उक्त समय सन्दर्भ पर विचार करते हुए मूल्यांकन की नयी दिशाओं की ओर संकेत करती है। ऐसे में इस कालखण्ड के रचनाकारों की आलोचनात्मकता, उनके औ$जार, उनके चश्मे को ला¡ग नाइन्टीज के समय के इतिहास के सन्दर्भ में देखने की रचनात्मक आवश्यकता है।

14 comments:

Udan Tashtari said...

हिन्दी चिट्ठाजगत में आपका हार्दिक स्वागत है. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाऐं.

manoj said...

sir, sahitya ki samya sapekshata ka postmoerdem bhut nyara laga .bhahut mahin-mahin kalam chalayi hai.

बी एस पाबला said...

हिंदी ब्लॉगजगत में आपका स्वागत है।

दिल दुखता है... said...

हिंदी ब्लॉग के लिए आपको शुभकामनाएं....

नारदमुनि said...

narayan narayan

mastkalandr said...

bahut sahi aur sati likha hai .., abhinandan ..mk

mastkalandr said...

bahut sahi aur sati likha hai .., abhinandan ..mk

"VISHAL" said...

kuch samajh me ayay aur kuch upar se nikal gaya.

---------------------------"VISHAL"

इरशाद अली said...

आपका हार्दिक स्वागत है
शुभकामनाएं

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर…..आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

ब्लाग संसार में आपका स्वागत है। लेखन में निरंतरता बनाये रखकर हिन्दी भाषा के विकास में अपना योगदान दें।
रचनात्मक ब्लाग शब्दकार को रचना प्रेषित कर सहयोग करें।
रायटोक्रेट कुमारेन्द्र

रचना गौड़ ’भारती’ said...

ब्लोगिंग जगत में आपका स्वागत है।
शुभकामनाएं।
कविता,गज़ल और शेर के लि‌ए मेरे ब्लोग पर स्वागत है ।
मेरे द्वारा संपादित पत्रिका देखें
www.zindagilive08.blogspot.com
आर्ट के लि‌ए देखें
www.chitrasansar.blogspot.com

आनंदकृष्ण said...

आज आपका ब्लॉग देखा.... बहुत अच्छा लगा. मेरी कामना है कि आपका ब्लॉग जन-सामान्य की भावनाओं और सरोकारों की अभिव्यक्ति हां सशक्त माध्यम बने और आपके शब्द निरंतर नई ऊर्जा, अर्थवत्ता और विस्तार पायें.
कभी समय निकाल कर मेरे ब्लॉग पर पधारें-
http://www.hindi-nikash.blogspot.com

शुभकामनाओं के साथ-
आनंदकृष्ण, जबलपुर
मोबाइल : 09425800818

बोधिसत्व said...

तथा के लिए शुभकामनाएँ...